उसकी यादें , मैं और रेलयात्रा

यात्रीगण ,कृप्या ध्यान दे,गाड़ी संख्या 15910 लालगढ़ से चलकर कटिहार,न्यू जलपाईगुड़ी, गुआहाटी के रास्ते  डिब्रूगढ़ को जाने वाली अवध-आसाम एक्सप्रेस प्लेटफार्म संख्या 5 पर कुछ ही समय में आने वाली है |

..जैसे ही हमलोग स्टेशन पर पहुंचे अनाउंसमेंट हो रही थी.
और ये आवाज़ कान में पड़ने के बाद कदम के चाल अपने आप ही तेज हो गए ,जल्दी से हम लोग प्लेटफार्म नंबर 5 पर पहुंचे .

सुबह के 7:32 बज रहे थे.तब तक ट्रेन आ चुकी थी,और लोग चढ़ने-उतरने में मशगूल थे.

भैया,जल्दी करिये, इसे पकड़िए ना बहुत भाड़ी है, मैं जैसे ही अपने बोगी के गेट के पास पहुंचा भैया को मैं अपना बैग देते हुए कहा..
इतना भाड़ी बैग है.. लामडिंग में कैसे उतारोगे,फिर तुम्हे ट्रेन भी बदलना होगा..मेरे हाथ से बैग लेकर भैया को देते हुए ,चिंता जाहिर करते हुए पापा बोले.

 

सबसे छोटा होने का यही फायदा है, आप कितने भी बड़े हो जाओ हर वक़्त आपके भैया ,पापा और मम्मी समझती है की बेटा अभी भी छोटा ही है. कभी कभी तो ये बुरा लगता है,परन्तु कभी-कभी बहुत ही अच्छा लगता है.. कम-से-कम अभी भी तो लोग आपकी केयर करते है, 20 वर्ष के हो जाने के बाद भी लोग आपको रेलवे स्टेशन पर छोड़ने आते है,बड़ी बात आप लड़की नहीं हो आप एक लड़का हो और तब भी आपकी मम्मी आपको स्टेशन पर छोड़ने आती है,ये फायदा है छोटा, नहीं,नहीं सबसे छोटा होने का… और वही फिल्मी ड्रामा, रोना-धोना और जब तक आप चुप नहीं कराते तब तक सुरु रहता है. जब तक ट्रैन नहीं आ जाती तब तक आपके सर पे वो प्यार से हाथ फेरना ,बहुत ही सुकून देता है..बहुत ज्यादा.

और मुझे भी वो प्यार ,वो जाते वक़्त रोना,सर पर प्यार भड़ी हाथ फेरना अभी तक मिल रहा है.

भैया और पापा जल्दी से बैग और बाकी सामान अंदर ले जा रहे थे

और मैं माँ का स्नेह पाने में मग्न था.अब माँ की आँखों से कुछ बुँदे मेरे हाथो से फिसल कर  वो फर्श पर  गिर जाने की पूरी तयारी में थे,और मैं उन बूंदो को अपने बदन में समाना चाह रहा था.उनके हाथ अब भी मेरे ऊपर छत्र छाया प्रदान कर रहे थे.

रोना तो मुझे भी आ रहा था,पर इतने लोग के सामने..और बचपन से ही हॉस्टल में रहने की आदत है, तो आत्म-संयम अपने आप पनप ही जाती है.

रोना-धोना,मिलन हो गया हो तो,जल्दी करो जाना तुम्हे ही है,पापा जोर से मजाकिया अंदाज़ में बोले.
हां, पापा आ रहा हूँ,और मैं माँ को प्रणाम किया और बोगी संख्या S11 में प्रवेश किया.

अरे बहुत भीड़ है, पापा आप बाहर जाओ , मैं इसको बैठा कर आता हूँ, भैया झुंझलाते हुए बोले.

पापा मेरी और देखने लगे और फिर उसी भीड़ में मैं जबरदस्ती झुक के पापा के चरण स्पर्श किये,

अच्छे से जाना कुछ दिक्क…. पापा अपनी बात खत्म कर पाते उससे पहले ही अरे बच्चा थोड़े ही है,और यह सब बातें आप फ़ोन पर बता दीजियेगा..अभी बाहर जाइये ना.. भैया इस बार और अधिक झुंझलाते हुए बोले.

बोलने के दौरान पसीने की कुछ बुँदे उनके नाको से होते हुए होठ की जोर पर उड़ कर मेरे ऊपर पड़ रही थी. उनका टी-शर्ट का कॉलर छोड़ के सारा भाग भीग चुका था.

72.. 71.. हाँ यह रहा 68 यही है ना तुम्हारा सीट संख्या ..भैया सीट नंबर 68 की और इशारा करते हुए पूछे
जी,भैया यही है..मैं भी हमीं भरा.
कल रात ही सीट कन्फर्मेशन का मैसेज आया था तो अच्छे से याद था.

हटिये,आप लोग.
अरे हटाइये ना इस बच्चे को.. भैया चिल्लाते हुए उसके बगल में बैठी एक लेडी को बोले.

वो भी डर के मारे उस लेडी की ओर देखने लगा..बड़े प्यार से हाथ से इशारा की. और वो लड़का वहाँ से खिसक कर अपनी उस लेडी के पास जा बैठा. लग रहा उसकी माँ थी.

और भैया, मेरा बैग वगैरा सही से रख के..जब आराम करने का मन करे तो इनलोगो को बोलना हट जाने को और आराम कर लेना,नहीं तो पिछली बार की तरह भलाई मत करने लग जाना किसी और को अपनी सीट देके, भैया सर में लगा हुआ पसीना पोछते हुए बोले.

हाँ,ठीक है नहीं दूंगा,. मैं अपनी सीट पर बैठते हुए जवाब दिया.

तभी कुछ ख्याल आया..किसी की याद आयी और मैं जल्दी से जेब से अपना मोबाइल निकाला और मोबाइल डाटा एक्टिव किया.. एक प्यारा सा ट्यून के साथ एक फेसबुक लाइट ने नोटिफाई किया, किसी प्यारे का मैसेज आया है..

“DIVYA MESSAGED YOU “..बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखा दिखाई दिया जैसे ही मैंने नोटिफिकेशन पैनल को नीचे की ओर खींचा.

अभी भी माँ बाहर खड़ी मेरी ओर देख रही थी,भैया भी उसी में सम्मिलित हो गए. और जिसका इंतज़ार था वो भी उस प्यारे से मैसेज ट्यून के साथ दस्तक दे चुकी थी,
इससे हसीन पल और क्या हो सकता था.सारे प्यारे लोग एक साथ,बहुत दिनों बाद एक साथ मन दुःख और खुश हो रहा था.ख़ुशी या जाने का ग़म, किसका इज़हार करूँ समझ ही नहीं आ रहा था.
और मैं कभी मोबाइल तो कभी माँ की ओर देख रहा था.

तभी एक लम्बी सीटी देने के साथ ट्रेन चल पड़ी..माँ को हाथ हिलाकर बाय-बाय करते हुए  चल पड़ा मैं अपने गन्तव्य स्थान को…
और मैंने बिना देरी करते हुए उस नोटिफिकेशन पर क्लिक किया..

" gud mrng..
Happy journey..govind "

और ये चार शब्द दिखते ही मेरे चेहरे पर एक प्यारी सी सुकून भरी मुस्कान आयी और मैं भी

"Awww..thanks
and gud mrning...dear "

रिप्लाई कर दिया.

और मैं उस खिड़की से बाहर पीछे जाते पेड़,तो कही पे फाटक पर इंतज़ार करते लोगो को देख रहा था.और इस रेस में वह शहर भी पीछे जाती दिख रही थी,
कभी वो माँ का वो खाने के लिए बार-बार बोलने वाला दृश्य नज़रो के सामने आ रहा था,
तो कभी वो नीले सलवार में भीगे बालो को तौलियों से पोंछती दिव्या का वो खूबसूरत सा  चेहरा सामने आ रहा था.

अब 2:16 हो रहे थे और ट्रेन कुछ ही देर में कटिहार जंक्शन पहुंचने वाली थी.और मैं अपना नाश्ता जो अभी भी ताजा ही लग रहा था,
बैग से निकल कर सीट पर रखा और एल्युमीनियम फॉयल हटाके एक छोटा सा टुकड़ा मुँह में रखा और आँख बंद करके जीभ से आगे पीछे करते हुए स्वाद लेने की कोशिश किया… हम्म , अभी भी ठीक ही है.,मन ही मन बोल के खुद को तस्सली दिलाई.

आप लोग दरभंगा में कहाँ से है..?? सामने की सीट पर बैठी हुई दादी मेरे बगल में बैठी ऑन्टी से पूछी
झंझारपुर से,आप लोग कहाँ से है..?? उन्होंने भी जवाब देते हुए पूछा.
मोकामा से है..
और फिर जो बातें शुरू हुई ..वो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी..ये झुमके कहाँ से ख़रीदे ,तो ये साड़ी कहाँ से ली,कितने बच्चे है..वगैरा,वगैरा..

किसी ने नहीं सभी ने सच ही कहा है,जब दो औरतें साथ मिल जाती है तो बात भी अपने आप ही मिल जाती है.

और मैं चुपचाप..पराठा खाये जा रहा था.कभी उनकी बक-बक तो कभी बाहर देख रहा था..

इसी दौरान उनकी की कुछ बातें कान,मेरे ध्यान को बाहर के दृश्य से भंग करती हुई,अपनी तरफ किसी मजबूत चुम्बक की तरह खींच ली,मेरे मुँह में पड़ा पराठा भी मेरे दुबारा चबाने का इंतज़ार कर रहा था,और मैं टकटकी लगायी कभी उस बच्चे तो कभी उनलोगो की ओर देख रहा था.

यह कितने साल का है..दादी ने उस बच्चे की ओर इशारा करते हुए पूछा.
10 साल का है, आंटी उसके सर पे हाथ फेरती हुई बोली.

बहुत ही प्यारा बच्चा है..कुछ बदमाशी भी नहीं करता है…दादी झूठी मुस्कान देती हुई बोली.

भारत में एक चीज़ बहुत ही अजीब है,जब कोई बच्चा शैतानी करे तो बोलते है कितना शैतान बच्चा है..नहीं करे तो भी समस्या है..हमारे यहाँ के लोग बहुत ही अव्वल किस्म के होते है.कही पर भी किसी की बुराई करना नहीं छोड़ते, हां, पर दिल के साफ़ होते है.

शायद..यहाँ पर कोई इसके उम्र का नहीं है ना, इसिलिये शांत बैठा है.. दादी फिर बोली.
शायद ,खुद को यकीन दिलाना चाह रही थी की यह बदमाश तो होगा ही..परन्तु,यहाँ पर कोई मिल नहीं रहा तो शांत बैठा है..

नहीं दरअसल बात ये है की…ऑन्टी ये बोलते हुए अपने बच्चे को और प्यार से देख रही थी,दरअसल ..उनकी आवाज में अब वो तेज नहीं दिख रहा था..जो कुछ वक़्त पहले झलक रहा था.

यह बोल नहीं सकता.. यह तो सही से माँ भी नहीं पता है..वो बोल के बिलकुल शांत है गयी..

मैं दादी और भी जितने लोग उनकी बातों को सुन रहे थे सब स्तब्ध होकर उस नादान परिंदे की ओर देखने लगे …

अभी जिसे कुछ वक़्त पहले भैया और मैं मिलके सीट से उठ के अलग बैठने को बोल रहे थे ..अभी उसी पर इतना प्यार आ रहा था.जिसका कोई मोल नहीं था.. अब तो वो निवाला भी मेरे हलक के अंदर नहीं जा रहा था और मैं बस उसे देख रहा था.

तभी एक झटके के साथ ट्रेन रुकी और अभी सफर बहुत बचा था,अभी तो शुरू ही हुई थी..
इसी सोच के साथ मैं जल्दी से अपना नाश्ता निपटा कर हाथ साफ़ करने ट्रेन की उस थूक से भड़ी पड़ी बेसिन के पास ना जाकर स्टेशन पर उतरकर हाथ साफ़ किया और तत्पश्चात अपने सीट पर बैठने पंहुचा.

वो प्यार से खिड़की के बाहर स्टेशन पर खड़ी भीड़ को निहार रहा था..परन्तु ,मुझे देखते ही सीट से उठकर जाने लगा..मैं उसे बैठने का इशारा किया और उसके बगल में जाकर बैठ गया.

पंकज नाम था उसका ,उसकी माँ उसे इसी नाम से पुकार रही थी.

तो पंकज किस क्लास में पढ़ते हो..??, मैंने उसके कंधे पर प्यार से अपना हाथ रखते हुए पूछा .
वो कुछ नहीं जवाब नहीं दिया तब मैंने अपने हाथ पर ऊँगली से लिखते हुए पूछा पढ़ते हो.
वो हाँ में सर हिलाया. इसके बाद फिर वो बाहर की ओर देखने लगा

मैं और बातें पूछने की कोशिश की परन्तु…वो मेरी बात समझा नहीं..और समझा भी तो मैं उसकी इशारे को अच्छे से नहीं समझ पाया.

और मैं दिव्या के साथ हुई पुरानी चैट्स पढ़ने लगा.. तभी कुछ ख्याल आया और मैं दिव्या को कॉल किया.

हाँ गोविन्द,कहाँ पहुंचे अभी तक ??कॉल रिसीव करते ही वो पूछी.
कटिहार से निकलेगी अब ट्रेन..और क्या कर रही हो.मैं बताते हुए पूछा.
ऐसे ही बैठ के टीवी देख रही हूँ..तेरा ना अभी कॉलेज खुल गया तो चला गया..मैं बस बोर हो रही थी तो कुछ देख के टाइमपास कर रही हूँ.. वो एक गहरी सांस लेते हुई जवाब दी.

और एक बात पता है..मैं बोला.
क्या..? सामने कोई लड़की खूबसूरत लड़की बैठी है क्या..? वो हँसते हुए बोली.
नहीं यार ..कुछ बातें है बताऊँ.. मैं अपनी आवाज को धीमे करते हुए बोला.
हाँ, बताओ ना.. वो जल्दी से उत्साहित होती हुई बोली.

कुछ बातें जो दिल के बेहद करीब है..और शायद तुम्हे कुछ लम्बी लगे..मैं मुस्कुराते हुए बोला .
उम्म्म.. हां, अच्छा रुको लिख के ही भेज दो.,थोड़ा रुक कर सोचते हुए बोली हुए बोली.
ठीक है.. बोलते हुए मैं फ़ोन डिस्कनेक्ट किया और …

“” सुबह के ठीक 8:22 हो रहे होंगे,मैं अभी-अभी अच्छे से उठा ही था.. क्यूंकि रात को ना जाने कितनी बार मोबाइल का लॉक खोल के इस समय के होने का इंतज़ार किया था..किसी से वादा जो लिया था.
मैं आँख मलते हुए बेसिन पर पहुंचा वहाँ पहले से नमन ब्रश कर था, तो मैं ऑन्टी के कमरे में जाकर,उस ओर देखा वह गेट अभी भी खुला पड़ा था..शायद,कल शाम से ही..जो की अमूनन बंद ही रहती है..

अब नमन ब्रश कर चुका था, मैं फ्रेश हुआ और हांथो में तौलियों लिए हुए आँखों एवं चेहरों को हलके से दबाते हुये उसी ओर देखने लगा ,अब मेरे चेहरे पर कुछ मायूसी के बदल छाने लगे थे,

क्या हुआ गोविन्द ,सुबह का वक़्त है.. खुश होना चाहिए बड़े चिंतित दिख रहे है.. तबियत तो ठीक है ना…आंटी नमन का भीगा बदन पोछने के लिए तौलिये तलाशते हुए पूछी
.
नहीं… कुछ नहीं.. ठीक हूँ..मैं तौलिया उनकी ओर उछालते हुए बोला.

और मेरी नज़र फिर उस दरवाजे की ओर गयी… वाइट टी-शर्ट एवं लाल सलवार में ..जो कि उसपर पूरी तरह सूट कर रही थी..लग रहा इस सुबह में कोई परी मेरे सामने खड़ी हो वो अपने बालो को ऊपर करती फिर उसके नीचे आ जाते इसी उधेरबन में बाल को दोनों हाथो से पकड़ के पीछे लेकर कस के बाँधी परन्तु ..उसके बाकी वो प्यारी मखमली गालो का दीवाना हो चुका था और उन्हें किसी भी कीमत पर चूमना चाहता था…फिर से आकर चूमने लगे और वो टहलने लगी ..उसका चेहरा उस सूर्योदय वाली सूर्य की तेज में और चमक रहा था.

उसकी नज़र इधर-उधर भटक रही थी..शायद किसी को ढूंढ रही होगी.लगभग 5 -6 मिनट तक टहलने के बाद वो फिर अपनी जुल्फें को एक ओर करती हुई अंदर जाने के लिए गेट के समीप पहुंची..
वो उसके जुल्फ..उसके गालो को स्पर्श करने का आदि हो गया था,चाहकर भी दूसरी तरफ नहीं जा रहा था..

और मैं उसकी लम्बी हसीन जुल्फों में किसी गुमनाम आशिक़ की तरह इस कदर खो गया की मुझे ख्याल ही नहीं रहा की वो मेरी और ही देख रही थी….और मैं वही ..उसी खिड़की से उसे जाते हुए निहारता रहा..बस देखता रहा… पता नहीं हुआ था पर उसमे कुछ अजीब सा अपनापन झलकता था उसमे कुछ अपना सा लगता है. “”

लिख के भेज दिया..

उसके छः मिनट बाद..

" 😌😍😚😘😘😘  "

रिप्लाई आया…

मैं मुस्कुरा रहा था,और ट्रेन अब और अधिक गति से चल रही थी…

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