कुछ यादें जो बनने बांकी है (NIT Silchar)

कमरे में था बैठा की एक ख्याल आया ,
कितने दिन 8-10 रोज हो गए आये यहाँ
 ,
अभी तो यादें बनने शुरू भी नही हुई यहाँ
बहुत सारी यादें बनानी यहाँ ,
नया शहर है नयी सी कुछ बात यहाँ ,
सबने कहा मनीष मत जाना वहाँ,
सबकी बातें छोड़
अपने दिल की सुन,
शायद,
कुछ तो अच्छा हो वहाँ ….
चला आया मैं यहाँ ,
चला आया मैं -सिलचर
नया शहर है नयी सी कुछ बात यहाँ ,
दिन तो वही ,पर ऐसी हसीन – डरावनी रातें और कहाँ ,
असमय गरजती बादलें और बिन मौसम बारिशें वाली बातें और कहाँ ,
अच्छे शिक्षक है थोड़ी अच्छी पढाई यहाँ …!
कुछ दोस्त बने ,चाहत है और दोस्ती की यहाँ ,
गोविन्द,तुषार ,अबिनाश ,उदित, तुम तो याद आओगे ही !!!
पर तुम बहुत याद आओगे -सिलचर
एक सुन्दर महबुबा की प्यारी सी बातों की तरह ,
नखरो की तरह ,
मुस्कान की तरह …..
हाँ ,
4 वर्ष बाद बहुत याद आओगे -सिलचर
किसी ने पहले भी तो सच ही कहा था …
दिल्ली से अब भी दूर पर ,अब दिल के करीब है -सिलचर
२ वर्ष गुज़ारने के बाद यंहा …….!!
अब तो मेरी भी चाहत है यही ,
8-10 दिन ही क्यों ,8-10 महीने ही क्यों ,
अब तो जिंदगी बिताने की चाहत यहाँ …..||
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